“चराग़े-दिल” ग़ज़ल-संग्रह का विमोचन

 

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book-cover.jpgचराग़े-दिल के रौशन से दिये अब जगमगाये है
सुरों के ताल पर गाकर ग़ज़ल सब गुनगुनाये है.

‘देवी’ नागरानी

देवी नागरानी जी के ग़ज़ल-संग्रह “चराग़े-दिल” का विमोचन श्री आर.पी. शर्मा”महरिष” जी के कर-कमलों द्वारा ‘बान्दरा हिंदू एसोशियेशन, मुम्बई ५०’ के स्थानपर २२ अप्रैल २००७ सांय ४ बजे समपन्न हुआ। इस शुभ अवसर पर देवी जी को आशिर्वाद देने के लिए जानी मानी हस्तियाँ मौजूद थीं।

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बाएं से दाएं:-
श्री मा.ना.नरहरि, श्रीमती देवी नागरानी, श्री गणेश बिहारी तर्ज़लखनवी,श्री राम जवाहरानी(चेयरमैन, सहयोग फौंडेशनं), श्री आर.पी. शर्मा महरिष्‘ ,श्री श्याम जुमानी, श्रीमती लता जुमानी, श्री मुरलीधर पांडे (संपादक, संयोग साहित्य).

विमोचन की अन्य तस्वीरें यहां देखिएः
चिराग़े-दिल
॰॰
श्री आर. पी. शर्मा महरिषजी ने चराग़े‍-दिलके समारोह पूर्ण विमोचन के लिये श्रीमती देवी नागरानी जी को बहुत बहुत बधाई एवं आशीर्वाद देते हुए इस मौके के लिये लिखी अपनी गज़ल पढ़ी, जो अंत में पेश है:mehrishi.jpg


न बुझा सकेंगी ये आंधियां
ये च़राग़े - दिल है दिया नहीं”

इस गज़ल संग्रह का शीर्षक चराग़े‍-दिलनागरानी जी के इसी शेर से प्रेरित है. जितना खूबसूरत शेर, उतना ही खूबसूरत शीर्षक. पुस्तक का आवरण भी खूबसूरत और उस पर अंकित खुशनुमा चित्र और वह भी आशचर्य जनक रूप से स्वयं नागरानी जी का क्मप्यूटर द्वारा बनाया हुआ. पुस्तक के समारोहपूर्ण विमोचन से निश्चय ही उनका व्यक्तित्व एवं क्रतित्व प्रकाश में आया और हम सभी को उनसे परीचित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. आप पहले से ही सिंधी में गज़लें कहति रहीं हैं और उनका सिंधी में एक गज़ल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है, इसलिये गज़ल की आपको अच्छी समझ है और हिंदी गज़ल-लेखन में आप इससे लाभाविंत भी हो रही हैं. सबसे बड़ी बात यह कि आपमें सीखने कि ज़बरदस्त ललक है. मेहनत करने से भि आप नहीं घबराती. आपका सव्भाव काव्यात्मक है और आपकी मौलिक प्रव्रति काव्य की लयात्मकता से मेल खाती है. इसे उर्दू में तबीयत का मौजूं होना कहते हैं. हज़त निश्तर ख़ानकाही के अनुसार यह गज़ल जैसी गेय कविता के लिये ज़रूरी भी है. आपके ही शब्दों में:
दो अक्षरों का पाया जो ग्यान तुमने देवी
उनसे निखर के आई शाइर गज़ल तुम्हारी.

आप कविता लिखने को एक स्वभाविक क्रिया मानती हैं, क्योंकि आपकी नज़र में हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, चित्रकार और शिल्पकार छिपा हुआ होता है. इस पुस्तक में कुछ विद्धवानों द्वारा नागरानी जी के व्यक्तित्व एवं क्रतित्व पर व्यक्त किये गए विचारों के अंश मैं यहां देना चाहूंगा, जो बहुत महत्वपूर्ण एवं सकारात्मक हैं।
श्री कमल किशोर गोयनका, भूतपूर्व प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविध्यालय के निकट यह सुखद आश्चर्य का विषय है कि नागरानी जी अमरीका में रहते हुए हिंदी में गज़लें कह रही हैं और हिंदी के प्रवासी साहित्य में अपनी विशेष पहचान बनाने के लिये इस गज़ल संग्रह के माध्यम से अपना पहला कदम मज़बूती से रख रही हैं.
श्री महमुदुल हसन माहिर, घाटकोपर, मुंबई. का कहना है कि नागरानी जी जो देखती और महसूस करती हैं, उसे ख़ास अंदाज़ से शेर के सांचे में ढाल लेती हैं, उनकी कल्पना की उड़ान बहुत बुलंद है. लिहाज़ा शाइरी में गहराई और गीराई पाई जाती है.
न्यूयार्क की डा॰ अंजना संधीर के शब्दों में देवी नागरानी अमरीकी हिंदी साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर हैं.
श्रीमती मरियम गज़ाला ने खास बात कही है, वह यह कि अमरीका जैसे देश में रहकर भी वो अपने संस्कार नहीं भूली. भारतीय महिला की गरिमा और महिमा का वे जीवंत उदाहरण हैं.
यहां मैं ग़ज़ल के मिज़ाज के बारे में भी कुछ कहना चाहूंगा. ग़ज़ल कोमल भी है और कठोर भी. उसका लहज़ा कभी नर्म तो कभी तीखे तेवर लिये होता है, तो कभी दोनों का मणि कांचन संयोग कुछ और ही लुत्फ़ पैदा कर देता है,

चटपटी है बात लक्षमण - सी मगर
अरथ में रघुवीर- सी गंभीर है
सुनके महरिषयूं लगा उसका सुख़न
चाप से अर्जुन के निकला तीर है.
हरियाना के प्रख़्यात उस्ताद शाइर सत्यप्रकाश शर्मा तफ़्ता ज़ारी‘ (कुरुक्षेत्र) ने तो ग़ज़ल से संबोधित एक अनूठी बात कही है, वे फर्माते है:

सुलूक करती है मां जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल
मगर एक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये.

कहने का मतलब यह कि नवोदतों के लिये तो ग़ज़ल मां जैसा व्यहवार करती है परन्तु इस विध्या में पारंगत व्यक्तियों को भी कभी अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है.
बात बनाये भी नहीं बनती” जैसी कठिन परिस्थिती इनके सामने उत्पन्न हो जाति है. इस शेर पर मेरी तज़्मीम भी है, -

निसार करती है उस पर ये ममता के कंवल
उसी के फिक्र में रहती है हर घड़ी, हर पल
मसाइल उसके बड़े प्यार से करती है ये हल
सुलूक करती है मां जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल
मगर इक अग्नि-परीक्षा है मुन्तही के लिये.

प्रख़्यात शाइर श्री क्रष्ण बिहारी नूरके एक मशहूर शेर :
चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं.

इस शेर पर मैंने अपनी ओर से तीन मिसरे लगाये हैं:
तुम जो चाहो तो ये भी कर देखो
हर तरह इसका इम्तिहां ले लो
लाख लालच दो, लाख फुसुलाओ
चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं.”

यह तज़्मीन श्री तर्ज़ साहिब को सादर समर्पित है.

अब मैं आपको एक पध्यात्मक रचना सुनाना चाहूगा, मौके की चीज़ है, समाअत फ़रमाएं:
आशीर्वाद श्रीमती देवी नागरानी जी को

किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा
इस चराग़े‍-दिलने की है रौशनी अच्छा लगा.

आप सब प्रबुद्ध जन को है मेरा सादर नमन
आप से इस बज़्म की गरिमा बढ़ी अच्छा लगा.

कष्ट आने का किया मिल जुल के बैठे बज़्म में
भावना देखी जो ये सहयोग की अच्छा लगा.

इस विमोचन के लिये देवीबधाई आपको
आरज़ू ये आपकी पूरी हुई अच्छा लगा.

इक ख़ज़ना मिल गया जज़्बातो-एहसासात का
हम को ये सौग़ात गज़लों की मिली अच्छा लगा.

आपको कहना था जो देवीकहा दिल खोलकर
बात जो कुछ भी कही दिल से कही अच्छा लगा.

भा गया है आपका आसान अंदाज़े-बयां
आपने गज़लों को दी है सादगी अच्छा लगा.

हर तरफ बिखरी हुई है आज तो रंगीनियां
रंग बरसाती है गज़लें आपकी अच्छा लगा.

ज़ायका है अपना अपना, अपनी अपनी है मिठास
चख के देखी हर गज़ल की चाशनी अच्छा लगा.

यूं तो महरिषऔर भी हमने कहीं गज़लें बहुत
ये जो देवीआप की ख़ातिर कही अच्छा लगा.

श्री आर. पी. शर्मा महरिष
२२ अप्रेल,२००७
दादर, मुंबई
*** ***

अहसास की रोशनी- ‘चराग़े‍-दिल
समीक्षकः
मा.ना.नरहरि

nar-hari-new.jpgश्रीमती देवी नागरानी की सद्यः प्रकाशित ग़ज़ल -सँग्रह उनकी नवनीतम पुस्तक है. अपने बच्चों-कविता, दिव्या और दीपक को उन्होंने अहसासों का गुलदस्ता भेँट किया है इस किताब के मारफ़त.

ग़ज़ल के विषय में श्री आर.पी.शर्मामहरिष्इस किताब में छपे अपने लेखदेवी दिलकश ज़ुबान है तेरीमें कहते हैः

ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है. ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है. इस विध्या में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है. ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद् गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब कोमुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूंद में सागर के समान समेट कर भर सकें.”

अब देखना ये है कि श्रीमती देवी नागरानी ग़ज़ल के विषय में क्या कहती हैः

कुछ खुशी की किरणें, कुछ पिघलता दर्द आँख की पोर से बहता हुआ, कुछ शबनमी सी ताज़गी अहसासों में, तो कभी भँवर गुफा की गहराइयों से उठती उस गूँज को सुनने की तड़प मन में जब जाग उठती है तब कला का जन्म होता है. सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी कभी तो चीखने भी लगती है.यह कविता बस और कुछ नहीं, केवल मन के भाव प्रकट करने का माध्यम है, चाहे वह गीत हो या ग़ज़ल, रुबाई हो या कोई लेख, इन्हें शब्दों का लिबास पहना कर एक आक्रति तैयार करते हैं जो हमारी सोच की उपज होती है.”

चराग़े‍-दिलअहसासों का गुलदस्ता है जिसमें मेरे मन के गुलशन के अनेक फूल हैं जो कभी महकते है, कभी मुस्कराकर मुरझा जाते हैं, तो कभी पतझड़ के मौसम के साए में बिखर जाते है, पर दिल का चराग़ फिर भी जलता रहता है. जलते बुझते इन चराग़ों की रोशनी से अपने ह्रदय के आँगन को रोशन रखने की कोशिश में ये शब्द बोलने लगते हैं, जिन्हें हम ग़ज़ल कहते हैं.”

वह कहती हैः

न बुझा सकेंगी ये आँधियां
ये चराग़े
-दिल है दिया नहीं.

शब्दों के तीर छोड़े गये मुझ पे इस तरह
हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था
.

और ऐसी स्थिति आने पर वह दिस्तों के बारे में कहती हैः

ग़ैर तो ग़ैर है चलो छोड़ो
हम तो बस दोस्तों से डरते हें
.

मुझे डर है देवी तो बस दोस्तों से
मुझे दुशमनों ने दिया है सहारा
.

लेकिन इस डर को वह अपनी माँ की दुआओं से जीतने की कोशिश करती हैं, सुने वो क्या कहती हैः

लेके माँ की दुआ मैं निकली हूँ
दूर तक रास्तों में साए हैं
.

जो रोशन मेरी आरज़ू का दिया है
मिरे साथ वो मेरी माँ की दुआ है
.

अपनी माँ के साए और दुआओं के साथ जब वो खुद को बयान करती है तो देखिये किस नज़ाकत के साथ बयान कर रही हैं:

मैं तो नायाब इक नगीना हूँ
अपने ही साँस में जड़ी हूँ मैं
.

ये नगीना जब अपने विचारों और सद्कर्मों से चमकता है तो देवी कहती हैः

यूँ ख़्यालों में पुख़्तगी आई
बीज से पेड़ बन गए
जैसे.

और ये पुख़्तगी जब उन्हें उस स्वार्थी समाज की बात करने के लिये आमदा करती है तो उनका विचार किस कदर साफ़ बयानी दिखाता हैः

चाहत, वफ़ा, मुहब्बत की हो रही तिजारत
रिशते तमाम आख़िर सिक्कों में ढ़ल रहे हैं
.

कितने नकाब ओढ़ के देवी दिये फरेब
जो बेनकाब कर सके वो
आईना नहीं.

किस किस से बाचाऊँ अपने घर
जब हाथ में है सबके पत्थर
.

इसी दौर से गुज़रते हुए अपने वजूद की पहचान पाते हुए कह रही हैः

ढूँढा किये वजूद को अपने ही आस पास
देखा जो आईना तो अचानक बिखर गए
.

इस बिखरने में जब कभी उन्हें प्यार का इशारा सहारे के तौर पर मिलता है तो अपने अहसासों को किस अँदाज, में बयां कर रही हैः

कुछ तो गुस्ताख़ियों को मुहलत दो
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं
.

वो तो देवी है दिल की नादानी
जुर्म मुझसे कहाँ हुआ है वो
.

जिसने रक्खा है कैद में मुझको
खुद रिहाई है माँगता मुझसे
.

वो मनाने तो आया मुझे
रूठ कर ख़ुद गया है
मगर.

इन अहसासों से गुज़रते हुए नागरानी जी के दिल में एक खामोशी कहीं बहुत गहरे तक छिप कर बैठ जाती है, लेकिन कमाल है यह ख़ामोशी बोलती है, चुप रह कर बात करती है, वह बड़ी खूबी से इस बात का जि़क्र करते हुए कह रही हैः

खामुशी क्या है तुम समझ लोगे
पत्थरों से भी बात कर देखो
.

कहते हैं बिन कान दीवारें भी सुन लेती हैं बात
ग़ौर से सुन कर तो देखो तुम कभी ख़ामोशियाँ
.

इन ख़ामोशियों को जब वह सुनती हैं तो उनकी आँखें तर हो उठती हैं

हुई नम क्यों ये आँखें बैठकर इस बज़्म में देवी
किसी ने ग़म को सुर और ताल में गा कर सुनाया है
.

इस ग़म से निजात पाने के लिये वह बंदगी की बात किस नज़ाकत से ज़ाहिर कर रही हैं:

ख़ुद ब ख़ुद आ मिले ख़ुदा मुझसे
कुछ तो अहसास बँदगी में हो
.

इसी बंदगी के साथ साथ वो आदमी की मेहनत, ईमानदारी और लगन से किये गए काम के नतीजे को देख कर क्या महसूस करती है, देखियेः

यूं तराशा है उनको शिल्पी ने
जान सी पड़ गई शिलाओं
में.

श्रीमती देवी नागरानी ने दुःख सुख, सहानूभूति, साँसारिक उठा-पटक, प्रेम, वियोग, समाज के अनेक चेहरों को उजगार किया है अपने शेरों में. श्री आर. पी. शर्मामहरिष्जी की इस्लाह से छपी यह पुस्तक दोष मुक्त है. देवी नागरानी नेमहरिष्जी के लिये कहा हैः

सारा आकाश नाप लेता है
कितनी ऊँची उड़ान है तेरी
.

यह ग़ज़ल-संग्रह ग़ज़ल लिखने वालों में अपना स्थान बनायेगा ऐसी मुझे आशा है,

मा.ना.नरहरि
Shripal Van no.1, C wing, G-10

Kharodi Naka, Dist Thana

Virar E 401303

*** *** ***

श्री गणेश बिहारी “तर्ज़” लखनवी साहिब ने चराग़े‍-दिलके लोकार्पण के समय श्रीमती देवी नागरानी जी के इस गज़ल-संग्रह से मुतासिर ganesh-behari.jpgहोकर बड़ी ही ख़ुशबयानी से उनकी शान में एक कत्ता स्वरूप नज़्म तरन्नुम में सुनाई जिसके अल्फ़ाज़ हैं:

लफ्ज़ों की ये रानाई मुबारक तुम्हें देवी
रिंदी में पारसाई मुबारक तुम्हें देवी
फिर प्रज्वलित हुआ चराग़े‍-दिलदेवी
ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

अश्कों को तोड़ तोड़ के तुमने लिखी गज़ल
पत्थर के शहर में भी लिखी तुमने गज़ल
कि यूँ डूबकर लिखी के हुई बंदगी गज़ल
गज़लों की आशनाई मुबारक तुम्हें देवी
ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

शोलों को तुमने प्यार से शबनम बना दिया
एहसास की उड़ानों को संगम बना दिया
दो अक्षरों के ग्यान का आलम बना दिया
महरिषकी रहनुमाई मुबारक तुम्हें देवी
ये जशने रुनुमाई मुबारक तुम्हें देवी.

श्री गणेश बिहारी “तर्ज़” लखनवी
लोखन्डवाला, मुँबई
२२ अप्रेल,२००७
*** ***

श्री राम जवाहरानी ने इस लेखन कला को अपने नज़रिये से परखते हुए कहाः

ram-jawaharani-cropped.jpgमंच पर बैठे साहित्य के सभी महारथ व वरिष्ठ कवि गण की हाज़िरी में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देवीजी का यह पहला कदम उनके जुनून, एक लगन, एक दिवाने पन की पेशकश है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपनी भावनाओं, अपनी उमंगों को, अपनी जज़बात को शब्दों के माध्यम से ज़माने तक पहुंचाने का बख़ूबी प्रयास किया है. उन्होंने अपनी सोच को शब्दों के साथ साथ निहायत ही अजब ढंग से इन्सानी भावनाओं को पेश किया है जो काबिले तारीफ है. सोच का निराला अंदाज़ है, शब्दों का खेल भी निराला. कई अंदाज, से शम्अ परवाने की बात का ज़िक्र आया है, लिखा व पढ़ा गया है, पर गौर से सुनें देवीजी क्या कहती है, किस कदर निराले अंदाज, से कम शब्दों में पेश किया है, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है वह ग़ज़ल की लेखन कला से बख़ूबी वाकिफ़ है. “

उसे इशक क्या है पता नहीं
कभी शम्अ पर वो जला नहीं
.

न बुझा सकेंगी ये आँधियां
ये चराग़े दिल है दिया नहीं
.
कल ही की बात है जब देवी नागरानी जी सिंधी साहित्य में अपनी कलम के ज़ोर से अपनी जान पहचान पाने लगी
. वे कहानी, गीत गज़ल पर अपनी कलम आज़मा चुकी है, पर हिंदी में चराग़े-दिल का प्रकाशन पुख़्तगी से रक्खा हुआ उनका पहला कदम है हिंदी साहित्य जगत में, जो काबिले तारीफ है. मैं आशा करता हूं कि पुख़्तगी से रक्खा गया उनका यह पहला उनका यह पहला कदम उनकी आने वाली हर राह को रोशन करता रहे.
मेरी दिल से मुबारकबाद है उन्हें इस
सफल प्रयास पर.
श्री राम जवाहरानी

Chairman of SahyoG Foundation
2 Bhagat Society
Plot 417/B,
14th Road
Bandra, Mumbai 50.
**

devi_nangrani.jpgकविता क्या है?” - ‘देवीनागरानी

चराग़े‍-दिलमें मेरे अंतर मन की भावनाओं का एक ऐसा गुलदस्ता जो लोकार्पण के इस अवसर पर , कार्यक्रम में उपस्थित सभी वरिष्ट कवि गण व मुख्य महमानों को सादर अर्पित करती हूँ.

चराग़े‍-दिल मेरे प्रयास का पहला पड़ावश्री महरिषगुंजार समितिके आंगन में लोकार्पण उन्ही के मुबारक हाथों से पा रहा है यह मेरा सौभाग्य है. इस समिति के अध्यक्ष श्री. आर. पी. शर्मा जिन्हें पिंगलाचार्यकी उपाधि से निवाज़ा गया है, छंद शास्त्र की विध्या और परिपूर्णता का एक अनोखा विश्वविध्यालय है लगता है एक चलती फिरती गज़ल है. उनके नक्शे पा पे चलते अपने अंतरमन की गहराइयों में खोकर मैंने जो कुछ वहां पाया, वही गज़ल गीत का पहला सुमन चराग़े‍-दिलआपके सामने है.
आज आपके समक्ष खड़ी हो पाने का साहस लेकर यही कह सकती हूं कि लेखन कला एक ऐसा मधुबन है जिसमें हम शब्द बीज बोते हैं, परिश्रम का खाध्य का जुगाड़ करते हैं और सोच से सींचते हैं, तब कहीं जाकर इसमें अनेकों रंग बिरंगे सुमन निखरते और महकते हैं.
कविता लिखना एक क्रिया है, एक अनुभूति है जो ह्रदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है. एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूंजी है, शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है. किसी न किसी माध्यम द्वारा सभी अपनी भावनाएं प्रकट करते हैं, पर स्वरूप सब का अलग अलग होता है. एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर एक स्वरूप बनाता है जो उसकी कल्पना को साकार करता है, चित्रकार तूलिका पर रंगों के माध्यम से अपने सपने साकार करता है और एक कवि की अपनी निश्बद सोच, शब्दों का आधार लेकर बोलने लगती है तो कविता बन जाती है, चाहे वह गीत स्वरूप हो या रुबाई या गज़ल.
जिंदगी एक सुंदर कविता है पर कविता जिंदगी नहीं, इस बात का समर्थन श्री आर. पी. शर्मा महरिषका यह शेर बखूबी बयान करता है:

ज़िंदगी को हम अगर कविता कहें
फिर उसे क्षणिका नहीं तो क्या कहें.

किसीने खूब कहा है कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है. कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी ओर कविताकेवल भाषा या शब्द का समूह नहीं. उन शब्दों का सहारा लेकर अपने अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला गीत-गज़ल है, उसी बात का ज़ामिन महरिषजी का एक और शेर है:

वो अल्फ़ाज़ मुंह बोले ढूंढती है
गज़ल ज़िंद: दिल काफिए ढूंढती है.

बस शब्द बीज बोकर हम अपनी सोच को आकार देते हैं, कभी तो सुहाने सपने साकार कर लेते हैं, तो कहीं अपनी कड़वाहटों का ज़हर उगल देते हैं. सुनते हैं जब गमों के मौसम आते हैं तो बेहतरीन शेर बन जाते हैं. इसी सिलसिले में मुझे वरिष्ठ कवि श्री मा.ना.नरहरि जी का शेर याद आ रहा है:

सबने सौंपे अपने अपने ग़म, आंसू
मैं टूटा हुं ऐसी ही सौग़ातों से.

बस शब्द बीज के अंकुर जब निकलते हैं तो सोच भी सैर को निकलती है, हर दिशा की रंगत साथ ले आती है. चराग़े‍-दिलभी उन्हीं धड़कते अहसासों का गुलदस्ता है जहां कभी तो सोच का परिंदा पर लगाकर ऊंचाइयों को छू जाता है, तो कभी ह्रदय की गहराइयों में डूब जाता है. मेरी एक गज़ल का मक्ता इसी ओर इशारा कर रहा है:

सोच की शम्अ बुझ गई देवी
दिल की दुनियां में डूब कर देखो.

यहां मैं माननीय श्री गणेश बिहारी तर्ज़ जी के दो शेर पेश करती हूं जो इस सिलसिले को बखूबी दर्शाते हैं:

होने को देख यूं कि न होना दिखाई दे
इतनी न आंख खोल कि दुनियां दिखाई दे.

एक आसमान जिस्म के अंदर भी है
तुम बीच से हटों तो नज़ारा दिखाई दे.

आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अता करते हुए मैं अपनी एक गज़ल “मेरे वतन की खुशबू” पढ़ रही हूं, जो मैंने डाँ अंजना सँधीर के “प्रवासिनी के बोल” को समर्पित की थी, इसी भावना के साथ कि प्रवासिनी होते हुए भी मैं वतन से दूर हूं पर वतन मुझसे दूर नहीं. बस यही मेरे अहसास है, यही मेरी गज़ल भी.

देवी नागरानी
, कार्नर व्यू सोसाइटी
१५/३३ रोड, बांद्रा, मुंबई ५०
*** ***

चराग़े‍-दिलकी रौशनी में श्रीमती देवी नागरानी

श्री श्याम जुमानी:

jumani-cropped.jpgजब यह गज़ल संग्रह मरे हाथ आया तो पहले मैं इस उन्वान को देखता रहा. और फिर उस दिल फ़रेब कवर पेज के चराग़ों को जो बहुत कुछ कह रहे है:

न बुझा सकेंगी ये आंधियां
ये च़राग़े-दिल है दिया नहीं.

तजुरबों के दौर से गुज़र कर उन्होंने जिन अहसासात को बयान किया है वो कहीं न कहीं जाकर हमारे तुम्हारे बन जाते हैं. इन गर्दिशों के दौर में शोर के बीच तन्हाइयों को महसूस करती हुई ये भावनाएं देखिये:

बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं
बस मेरी जिंदगी में ये तन्हाइयां रहीं. प ३९

 

 

सोच की उड़ान, बेजान में जान फूंकने की बात किस कदर इस शेर से बख़ूबी बयां हो रही है देखिये एक अलग अंदाज़:

यूं तराशा है उनको शिल्पी ने
जान सी पड़ गई शिलाओं में. प २

इस फ़न को सीखने की चाह में देवीजी ने अपने शब्दों के स्वरूप में जान फूंकने का सफल प्रयास किया है और छोटे बहर में एक नाजुक ख़याल को बरपा करना एक काब़िल कदम है. दुख दर्द से हमारी पहचान तो होती है पर इनका अंदाज़े-बयां देखिये, कहती हैं :

दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो
आहट के बिन आ जाते हैं.

हर अहसास को शब्दों के माध्यम से सुंदरता से बेजोड़ बना के प्रस्तुत किया है देवीजी ने, दूर की सोच नज़दीकियों को कम करती हुई दिखाई देती है, कहीं दूरियों में फासले बढ़ाते हुए अहसास किस कदर दर्शा रहीं है वे, सुनें उनकी ज़ुबानी:

बदगुमानी का ज़हर है ऐसा
सब हरे पेड़ सूख जाते हैं. प १२२

कतरा कतरा वजूद से लेकर
ख़्वाहिशों को लहू पिलाते हैं. प १२२

मेरी शुभकामनायें उनके साथ है कि उनका यह पहला प्रयास एक मुकम्मिल कदम साबित हो और वो ऐसे अनेक चराग़ रौशन करती रहें.
श्याम जुमानी
हैदराबाद.
*** *** ***
चराग़े-दिल
वाक़ई चराग़ है। पढ़ते हुए ज्यों ज्यों ग़ज़लों का शुमार बढ़ता जाता है, साथ साथ ही निखार भी बढ़ता जाता है। देवी जी की ग़ज़लों का हर पहलू दिल में एक टीस सी
छोड़
देता है, हर शेर अपनी ज़िम्मेदारी निबाह रहा है।
mahavir_-sharma.jpg एक मुकम्मल ग़ज़लों का गुलदस्ता है।चराग़े-दिलकी रौशनी आख़िरी सफ़े तक ही महदूद नही रहती बल्कि किताब के कवर तक पहुंच कर वतन की खुश्बू से फ़िज़ा को महका देती है।
पढ़ने
के बाद महसूस होता है कि यह सिर्फ़ गज़लों का संग्रह ही नहीं है,
बल्कि
देवी जी के उम्र भर के तजुर्बों से भरी हुईज़िंदगी की किताबहै। रंगे-तग़ज़्ज़ुल तो देवी जी के लिए एक क़ुदरत की देन है। ग़ौर से ग़ज़लों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि उनकी एक अपनी दिलकश शैली है, अपना ही अंदाज़े-बयां है। यह क़बिले तारीफ़ है कि दिलो-दिमाग़ में जो ख़याल शेर बन कर नपे-तुले लफ़्ज़ों में क़लमबंद हो कर शेर बन जाता है, पढ़ने वालों के दिलों पर वैसी ही छाप बन जाती है।
श्री आर.पी. शर्मामहरिषजी और दीगर तजर्बाकार शाइरों की रहनुमाई और मदद से
एक
दिन देवी जी की ग़ज़लगोई और नज़्म निगारी का शौक़ उन लोगों के लिए जो ख़ुद शाइर या अदीब तो नहीं है लेकिन जिनको शेर-ओ-शाइरी से शग़फ़ और मुहब्बत है, ग़ज़ल
की
बारिकियां सिखाते हुएचराग़े-दिल से चराग़ जलते रहेंकी रवायत को क़ायम रखे रहेंगी।
महावीर शर्मा
लन्दन.
mahavirpsharma@yahoo.co.uk

*** *** ***
/ डॉ. ऋषभदेव शर्मा
rishabhdevsharma1.jpg

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद - 500 400

 

पुस्तक चर्चा

दिनांकः 14. 06. 2007
चराग़े-दिल
देवी नागरानी (1941) का जन्म कराची में हुआ और शिक्षा-दीक्षा न्यूजर्सी (अमेरिका)
में। मातृभाषा सिंधी है। सिंधी भाषा में रचित उनकी ग़ज़लों का एक संग्रहगम में भीगी
खुशी2004 में प्रकाशित हो चुका है। अबचराग़े-दिल (2007) शीर्षक से उनकी हिंदि गज़लें
सामने आई हैं। 119 गज़लों के इस संग्रह में सरल, सहज प्रवाहपूर्ण भाषा में उन्होंने जीवन
के विविध अनुभवों, सपनों और कल्पनाओं तथा मान्यताओं को काव्यात्मक अभिव्यक्ति
प्रदान की हैं। यह अभिव्यक्ति जहाँ एक और कवयित्री के संवेदनशील मन से पाठक की
जान-पहचान कराती हैं, वहीं अपने सामाजिक सरोकारों के सहारे उसके मन को झकझोरती
भी है।
काव्यानुभव में ढलने के लिए रचनाकार को जिस प्रकार के जीवनाभुव की आवश्यकता
होती है, देवी नागरानी के पास उसकी कमी नहीं है। पीड़ा की ये अनुभूतियाँ ही रचनाकार को

काव्यसृजन के लिए विवश करती है -
कितने पिये हैं दर्द के आंसू बताऊँ क्या
ये दास्ताने गम भी किसी को सुनाऊँ कया?’
इस दास्ताने गम में जहाँ एक ओर सिश्तों की टूटन शामिल है, वहीं दूसरी ओर भाइयों के परस्पर
शत्रू बन जाने की स्थितियाँ, तीसरी ओर विपरीत परिस्थितियों से निरंतर संघर्ष करने की मजबूरी,
चौथी ओर बहार और पतझड़ के द्वंद्व में पली दीवानगी तथा पांचवीं ओर दोस्तों की साजिशों को
जानकर भी उन पर इल्ज़ाम लगा पाने की विवशता शमिल है। इन तमाम गमों के बीच
एकाकीपन में स्मृतियों की दौलत ही संवेदनशील मन का एकमात्र संबल है। ऐसे में अगर रोना
आए तो और क्या हो-
कांच का जिस्म लेकर चले तो मगर, देखकर पत्थरों का नगर रो दिए।
अनेक गज़लों की अंतिम पंक्तियाँ (मक़्ता) देवी नागरानी दी अंतर्मुखता के साथ-साथ समाज
के प्रति शिकायत को बखूबी बयान करती हैं। जैसे -
कोई नहीं था देवी गर्दिश में मेरे साथ,
देवी जहाँ में अब कहां अच्छाइयाँ रही।
जिंदगी तो है बेवफ़ा देवी, इसने मुझको गुमान में रखा।
उसने धोखा दिया हमें देवी, राज़ेदिल जिसको भी ताया है।
मुझे डर है देवी तो बस दोस्तों से, मुझे दुश्मनों ने दिया है सहारा।
इसके बावजूद कुछ ऐसी भी मधुर अनुभूतियाँ हैं जो इन तमाम विपरीत परिस्थितियों
में भी जीने का हौसला देती हैं तथा जिंदगी कओ खूबसूरत बनाती हैं, और तब कवयित्री
कह उठती है,
देवी लेकिन, प्यार के इंद्रधनुष याद बहुत आते हैं।
इन विविध प्रकार के अनुभवों ने कवियित्री के चिंतन को मानवतावादी
विस्तार प्रदान किया है। वास्तव में जब तक मनुष्य व्यक्तिवादी गुफा में छिपा रहता
है तब तक ही वह अकेला, दुखी और असाहय रहता है। लेकिन जब वह मानवतावादी
आकाश में उडान भरता है तो सहज ही उसका अकेलापन सामाजिकता में, दुःख
संवेदना में और असाहयता करूणा में विलीन हो जाती है। इसी के फलस्वरूप देवी
नागरानी की गज़लों में अनेक सूक्तियाँ भी रूपाकार ग्रहण करती दिखाई देती है। जैसे,
खुशी बाँटने से बढ़ेगी जियादा, नफ़े का सौदा इसे मत गँवाना।
नहीं उसने हरगिज रज़ा रब की पाई,
जिसने कभी हक की रोटी कमाई।
शक की बुनियाद पर महल कैसा,
कुछ ईमान दोस्ती में हो।
इस में संदेह नहीं कि देवी नागरानी की ये गज़लें निराशा में आशा की तलाश
और अंधेरे से रोशनी की यात्रा की गज़लें हैं। निराशा और अंधेरे का कारण है विश्वासघाती
और क्रूर दुनिया, तो आशा और रोशनी का स्रोत है प्रेम और सामाजिकता। जब तक सच्चा
प्रेम नहीं मिलता तब तक यह खोज चलती रहती है, यात्रा चलती